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क्या बच्चे को प्ले स्कूल भेजना जरूरी है?

 क्या आपको अपने बच्चे को प्ले स्कूल में भेजना चाहिए? 

क्या बच्चे को प्ले स्कूल भेजना जरूरी है?  इसका निर्णय लेने से पहले आपको कुछ विचार  करना चाहिए
क्या बच्चे को प्ले स्कूल भेजना जरूरी है? इसका निर्णय लेने से पहले आपको कुछ विचार  करना चाहिए

 इसका निर्णय लेने से पहले आपको कुछ विचार  करना चाहिए

 कुछ दशक पहले भारत में प्ले स्कूलों की आवश्यकता अनसुनी थी 

 बहुत कम लोग अपने बच्चों का प्ले स्कूल में दाखिला कराते थे,

फिर भी हर कोई परिपक्व, समझदार पढ़ा लिखा और और भाषा का जानकार होता था

अब हालांकि ऐसा लगता है जैसे हर माता-पिता अपने बच्चे को प्री नर्सरी या प्लेस्कूल में भेज देते हैं

 भारत में अधिकांश प्ले स्कूल निजी है

 यदि आप भी उनमें से एक है जो अपने बच्चे को प्ले स्कूल या प्री नर्सरी में भेजना चाहते हैं तो पहले इन कुछ बिंदुओं पर विचार जरूर करें 

समय

 क्या आपके पास अपने बच्चे के साथ बिताने के लिए पर्याप्त समय है? 

प्ले स्कूल में जाकर बच्चों को दूसरे बच्चों के साथ बैठने और स्कूल के वातावरण की आदत पड़ जाती है ऐसे में औपचारिक शिक्षा के लिए स्कूलों में भर्ती होने पर उन्हें कम परेशानी होती है 

 यदि आप और आपके जीवनसाथी दोनों काम के लिए घर से बाहर रहते हैं और आपके पास अधिक समय नहीं है, तो आप अपने बच्चे को पढ़ाने के लिए समय नहीं दे पाएंगे

इस अवस्था में आप अपने बच्चे को प्लेस्कूल में भर्ती करवा सकते हैं

 हालांकि अगर माता या पिता में से कोई एक घर पर रुकता है एवं अपने बच्चे को पढ़ाने का समय निकाल सकता है तो आपको अपने बच्चे को प्लेस्कूल में भर्ती करवाना  अनिवार्य नहीं है

 याद रखें बहुत छोटे बच्चों में सीखने की अद्भुत क्षमता होती है

उनका दिमाग बहुत तेज होता है, अनुकूल वातावरण मिलने पर बच्चे बहुत कुछ सीखते हैं

 शैक्षणिक दिनचर्या

 अपने बच्चे को प्ले स्कूल में डालने से पहले  प्लेस्कूल के बारे में कुछ जानकारी हासिल करें कोई ऐसा स्कूल खोजें जहां  बच्चों को सिखाने के लिए खेलकूद के तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है 

जहां आपके बच्चे को नई चीजें सीखने के लिए संघर्ष न करना  हो

सामाजिक अवसर

 प्ले स्कूल बच्चों को अन्य बच्चों के साथ मिलजुल कर रहने का अवसर प्रदान करते हैं

इसके अलावा वहां धीरे-धीरे एक अनौपचारिक तरीके से अभ्यास कराया जाता है जिससे बच्चों को औपचारिक स्कूल में भर्ती होने पर परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ता

इसलिए यदि आप एक अलग-थलग पड़ोस में रहते हैं या ऐसी जगह पर जहां आपके बच्चे के उम्र के कई बच्चे नहीं है तो आप जरूर अपने बच्चे को एक प्लेस्कूल में भेजने का तय कर सकते हैं

 आपका बच्चा छोटी उम्र में कई बच्चों के साथ बातचीत करना सीखेगा 

अपने बच्चे को प्ले स्कूल भेजने के सामाजिक लाभ ले, लेकिन चमत्कार की उम्मीद ना करें

 यदि आपका बच्चा शर्मिला है तो उसे प्लेस्कूल में  भेजने मात्र से वह आत्म विश्वासी व्यक्ति नहीं बन जाएगा

अपने बच्चे के आत्मविश्वास का विकास करने के लिए आपके पास अन्य तरीके भी हैं,

यदि आपके आसपास कोई स्थानीय क्लब है  तो आप अपने बच्चे का वहां खेल में दाखिला करवा सकते हैं

दिनचर्या

 प्ले स्कूल में भेजने से आपके बच्चे की एक दिनचर्या बन जात हैं 

 हालांकि यह भी याद रखें कि जो बच्चे प्लेस्कूल में नहीं जाते वह भी 12 से 14 साल स्कूल और कॉलेज में जाकर एक दिनचर्या के आदी हो जाते हैं

 उनका व्यक्तित् उनकी सोचऔर उनके द्वारा उठाए गए कार्य पर निर्भर करता है, ना की  इस बात पर की उन्होंने अपने प्रारंभिक शिक्षा प्लेस्कूल से की है या नहीं

Read in English: Is Playschool Education Necessary?

Related topic: Happy Childhood, let me put it differently

इस अद्भुत यात्रा में आप सभी को शुभकामनाएँ। 

यदि यह सुझाव आपको अपना उत्तर खोजने में मदद करते हैं तो कृपया पोस्ट को लाइक करें और कमेंट करें

 यदि परवरिश शैली से संबंधित आपका कोई और प्रश्न है तो उसे भी कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं

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It is tough, or is it? Lets run! Give it a try to answer yourself.

Lets run! It is tough, or is it? 

Lets run! It must be tough.

Will I be able to finish it?

But I am not as fit as you?

I don’t even exercise?

My children to do it when they grow, but I can’t .

Don’t know anyone there, I will be alone.

What will others think when they see me going like a tortoise?

Lets run! It is tough, or is it? 

I was bombarded with many more questions last week when Lets run, CG's First Runners Community, featured me. They called me runner when I was just running for myself.  Lets run! It is tough, 
 It must be tough.
 Or is it?

I was bombarded with many more questions last week when Lets run, CG’s First Runners Community, featured me. They called me runner when I was just running for myself. 

*They called me runner when I was just running for myself.

**They called me runner when I was just running for myself.

It is not a typo mistake. You are reading it right. That is how they operate. Yes, you are still reading it right. They operate that way. 

So much of enthusiasm and cooperation in and around team. They don’t let anyone feel left out. Other than being part of two 100 days of running, I participated in the marathon organised by them twice. And you can take it from me it was well managed and disciplined. Best part being always on time.  

Source of all these questions is this one page from lets run

Featured Runner

Roshni Shukla

A kindergarten teacher, part time house maker and mother of two. Yes, I do Run around my kids at home and school, but that is all.

– NOPE our Featured runners is a strong girl who took 100 days running challenge and dusted it.

I was bombarded with many more questions last week when Lets run, CG's First Runners Community, featured me. They called me runner when I was just running for myself.

Lets run, CG’s First Runners Community – they call themselves Passionate about running. They have some fixed days for Runs /Workouts. All Runs / Workouts schedule are posted on their Facebook page.

Lets run! It is tough, or is it?
Lets run! It is tough, or is it?
Lets run! It is tough, or is it?
Lets run! It is tough, or is it?

This is my experience with the run. I grew stronger after every attempt.

Now for those who are tempted to make an amazing memory, I have good news, Lets run is organizing a bigger event this time by the name The Great Chhattisgarh Run – TGCG. It is on 17th November 2019. 

Now coming back to questions asked by people who got to know about me being featured runner.

My answer to them would be: 

It is tough? —> It is not, if you really want to do it.

Will I be able to finish it? —> Yes, you will for sure. You will get a lot of encouragement en route.

But, I am not as fit as you? —>You can not judge your fitness before trying. Simple.

Don’t even exercise? —> It’s ok, you can always start it. 

I want my children to do it when they grow, but I can’t. —> You can, so can your child. To increase your comfort, let me tell you, my son did his first 6 km at the age of 6 the same day when I was doing mine. My daughter did her first 6 km skating much before she turned 6. Lets run events could be safest exposure you could give to your child. 

Don’t know anyone there, I will be alone. —> No, you will not be alone. There will be many to give you company if you really need it. Else take your friends and family. Marathon could be a good theme based meeting point for your circle. 

What will others think when they see me going like a tortoise? —> If you think you will be a tortoise, don’t worry, the event will stay open till the last tortoise crosses the finish line. 

You might find me there to cheer you up, if at all you are one of those tortoises. Hoping to meet you in the upcoming event.

Just do it. Give it a try to answer yourself.

Every man’s life ends the same way. It is only the details of how he lived and how he died that distinguish one man from another.

– Ernest Hemingway

Life is precious gift, live it to the fullest.

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स्कूल की छुट्टियां-2 । भूरी चली गई । (भाग 2)


स्कूल की छुट्टियां-2 । भूरी चली गई । (भाग 2)। स्कूल की छुट्टियां चालू हो गई हैं। हर साल की तरह हम फिर शिमला आए हैं। भूरी से खेलना मुझे बहुत पसंद है।लोग सोचते हैं, बिल्ली मतलबी होती है। कुत्ते की तरह वफादार नहीं। पर ऐसा नहीं है। बिल्ली भी अपने मालिक से बहुत प्यार करती हैं। बस उसके जताने का तरीका अलग होता है।

स्कूल की छुट्टियां-2 । भूरी चली गई । (भाग 2)। स्कूल की छुट्टियां चालू हो गई हैं। हर साल की तरह हम फिर शिमला आए हैं। स्कूल की छुट्टियां 2

शिमला में मेरी दादी रहती हैं। प्रधान चाचा की बिल्ली भूरी से खेलना मुझे बहुत पसंद है। पर इस बार मेरी उससे मुलाकात ही नहीं हुई है।

वो म्याऊ म्याऊ करती घूमती रहती थी इधर उधर। इस बार दिखाई ही नहीं दी इतने दिनों में भी।
स्कूल की छुट्टियां-2

पढ़ें: 

स्कूल की छुट्टियां । भुरी चली गई । भाग 1

दादी भुरी कहां चली गई है? बताओ ना कहां गई वो? क्या बिल्लियां बिल्कुल वफादार नहीं होती। क्या वो किसी की दोस्त नहीं बनती बताओ ना? 

प्रधान चाचा गुस्से में बोल रहे थे बिल्लियां किसी की नहीं होती। धोखेबाज होती हैं। क्या ये सही है दादी?
स्कूल की छुट्टियां 2

लोग सोचते हैं, बिल्ली मतलबी होती है। कुत्ते की तरह वफादार नहीं। पर ऐसा नहीं है। बिल्ली भी अपने मालिक से बहुत प्यार करती हैं। बस उसके जताने का तरीका अलग होता है।

पर चाची से मैंने पूछा तो चाची ने कहा, उनकी भुरी, बहुत प्यारी थी। और उनको भी वह बहुत प्यार करती थी। दादी बताओ ना फिर वो क्यों चली गई।

दादी ने मुझे एक तरफ बैठाया। और फिर समझने लगी।

 बिटिया रानी,  लो आज सुनो एक ऐसी कहानी, जो तुम्हे याद रहे पूरी जिंदगानी।

माना कि बिल्ली होती है अलग,

बिल्कुल अलग, कुत्तों से अलग,

फिर दादी ने बताना शुरू की वो बातें जिन्होंने बिल्लियों के लिए मेरी सोच बदल दी।

लोग सोचते हैं, बिल्ली मतलबी होती है। कुत्ते की तरह वफादार नहीं। पर ऐसा नहीं है।

बिल्ली भी अपने मालिक से बहुत प्यार करती हैं। बस उसके जताने का तरीका अलग होता है।

वो अपना गाल रगड़ कर चलती है उन लोगों से, जिनको वो पसंद करती है। उसे थोड़ा छू छू कर चलना पसंद होता है।

उससे सफाई पसंद होती है। वो बड़ी स्वतंत्र होती है।बड़ी सामाजिक और सहज।

वो हर उस जगह से हट जाती हैं, जहां का वातावरण सुखमय नहीं होता। वो झगडे, झंझट, लड़ाई से ज्यादातर दूर रहना पसंद करती हैं। 

स्कूल की छुट्टियां-2 । भूरी चली गई । (भाग 2)। स्कूल की छुट्टियां चालू हो गई हैं। हर साल की तरह हम फिर शिमला आए हैं। भूरी से खेलना मुझे बहुत पसंद है।

कोई परिस्थिति अनुकूल ना हो तो वो बैठ कर उसके सुधरने का इंतज़ार नहीं करतीं। खुद एक अनुकूल परिस्थिति की तलाश करती हैं। 

वो जब परेशान होती हैं, तो एकांत में बैठ कर वापस अपने चित्त को काबू में लाती हैं।

उन्हें भीड़ में रहना पसंद नहीं होता। वो अपनी मानसिक शांति को बनाए रखती हैं।

उन्हें उपेक्षा और दुराचार पसंद नहीं आता। ऐसे में वो अपने लिए नई जगह तलाशने लगती हैं। वो तनाव में रहना पसंद नहीं करतीं।

जब बिल्लियां बीमार पड़ जाती हैं या घायल होती है तो भी वो कहीं जा कर छुप जाती हैं। 

इसलिए तुम उसकी ज्यादा चिंता मत करो। वो आ जाएगी। बिल्लियों जैसी बनो, मेरी गुड़िया रानी।

लोग सोचते हैं, बिल्ली मतलबी होती है। कुत्ते की तरह वफादार नहीं। पर ऐसा नहीं है। बिल्ली भी अपने मालिक से बहुत प्यार करती हैं। बस उसके जताने का तरीका अलग होता है।

बिल्ली को इस तरह से नहीं जानती थी मैं। लग रहा है, जैसे थोड़ी बिल्ली जैसी तो मैं भी हूं।

भुरी मुझे इस गर्मी की छुट्टी में इतना कुछ सीखा के चली गई।

चाची से कहा है मैंने, जब भुरी आए तो वो मुझे खबर करें।

और चाची ने कहा है, अगले साल वो मुझे भुरी के साथ खेलने देंगी।

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बच्चे अपने जीवन में खिलौने* क्यों पसंद करते हैं?

बच्चे अपने जीवन में खिलौने क्यों पसंद करते हैं? यह उसी कारण से है जिस कारण हम वयस्क हमारे मनोरंजन के लिए चीजें चाहते हैं। खिलौने बच्चों और वयस्कों के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हम कार, बाइक, बेस्ट गैजेट, बेस्ट ड्रेस आदि रखना चाहते हैं। बच्चों के लिए यह जगह उनके खिलौनों से भर जाती है। एक बच्चे को अलग-अलग उम्र में अलग-अलग खिलौने पसंद आ सकते हैं।

खिलौने*? बच्चे अपने जीवन में खिलौने* क्यों पसंद करते हैं? यह उसी कारण से है जिस कारण हम वयस्क हमारे मनोरंजन के लिए चीजें चाहते हैं।

To read this article in english: Why do children like to have toys in their life?

खिलौने* बच्चों और वयस्कों के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हम कार, बाइक, बेस्ट गैजेट, बेस्ट ड्रेस आदि रखना चाहते हैं।

बच्चों के लिए यह जगह उनके खिलौनों से भर जाती है।

एक बच्चे को अलग-अलग उम्र में अलग-अलग खिलौने पसंद आ सकते हैं।

जानिए कुछ ऐसे खिलौने* जो हर उम्र के पसंद आते हैं।

जानिए कुछ ऐसे खेल, जो किसी भी उम्र में पसंदीदा हैं:

कैरम:

कैरम (स्पेल्ड कैरम) भी दक्षिण एशियाई मूल का खेल आधारित प्रचलित है।

यह खेल भारत, बांग्लादेश, अफग़ानिस्तान, नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका, अरब देशों और आसपास के क्षेत्रों में बहुत लोकप्रिय है, और विभिन्न भाषाओं में विभिन्न नामों से जाना जाता है।

दक्षिण एशिया में, कई क्लब और कैफे नियमित टूर्नामेंट आयोजित करते हैं। कैरम आमतौर पर बच्चों और सामाजिक स्तर में परिवारों द्वारा खेला जाता है।

शतरंज:

शतरंज एक दो-खिलाड़ी वाला खेल है जो एक बिसात पर खेला जाता है जिसमें 64 वर्गों को 8 × 8 ग्रिड में व्यवस्थित किया जाता है।

यह खेल दुनिया भर में लाखों लोगों द्वारा खेला जाता है। माना जाता है कि शतरंज 7 वीं शताब्दी से कुछ समय पहले भारतीय खेल चतुरंग से लिया गया था।

चतुरंगा पूर्वी रणनीति के खेल xiangqi, janggi, और शोगी का संभावित जनक भी हैं।

 लेगो:

लेगो का इतिहास लगभग 100 वर्षों का है, जिसकी शुरुआत 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में लकड़ी के छोटे-छोटे नट बनाने से हुई थी।

डेनमार्क में प्लास्टिक लेगो ईंटों का निर्माण 1947 में शुरू हुआ।

 लूडो:

लूडो दो से चार खिलाड़ियों के लिए एक रणनीति बोर्ड गेम है, जिसमें खिलाड़ी एक ही डाई के रोल के अनुसार चार टोकन शुरू से अंत तक दौड़ते हैं।

अन्य क्रॉस और सर्कल गेम्स की तरह, लूडो भारतीय खेल पचीसी से लिया गया है, लेकिन यह सरल है।

खेल और इसकी विविधताएं कई देशों में कई और नामों से लोकप्रिय हैं।

साँप और सीढ़ी:

साँप और सीढ़ी एक प्राचीन भारतीय बोर्ड खेल है जिसे आज दुनिया भर में क्लासिक माना जाता है।

यह एक गेमबोर्ड पर दो या दो से अधिक खिलाड़ियों के बीच खेला जाता है, जिसमें गिने-चुने वर्ग होते हैं।

बोर्ड पर कई “सीढ़ी” और “सांप” चित्रित किए गए हैं, जिनमें से प्रत्येक में दो विशिष्ट बोर्ड वर्ग हैं।

खेल सरासर भाग्य पर आधारित एक सरल दौड़ है, और छोटे बच्चों के साथ लोकप्रिय है। 

बच्चे अपने जीवन में खिलौने* क्यों पसंद करते हैं? यह उसी कारण से है जिस कारण हम वयस्क हमारे मनोरंजन के लिए चीजें चाहते हैं।

बच्चे कई कारणों से खिलौनों से जुड़ते हैं:

  • खिलौने बच्चों को सुखद समय और खुश यादों के साथ जोड़ देते हैं।
  • खिलौने जो बच्चे को वास्तविक जीवन की गतिविधियों से जुड़ने या उनकी नकल करने की सुविधा देते हैं, बच्चों को सबसे अच्छे लगते हैं।।
  • यह एक दोस्त के रूप में, बच्चे के जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान को भरता है।
  • खिलौने सामाजिक समारोह में भी उन्हें व्यस्त रखते हैं।
  • बच्चे सुरक्षित महसूस करते हैं, अगर उनके पास उनका खिलौना है।
  • आपने देखा होगा कि एक बच्चा नई जगह पर, ऊबने की शिकायत करने लगता है। इस तरह की स्थितियों में, अगर उसके पास अपना खिलौना है, तो यह शिकायत इतनी जल्दी नहीं आ सकती है।
  • खिलौने उनकी कल्पना शक्ति को बढ़ाए हैं और साथ ही उनकी काल्पनिक कहानियों में पत्र बनकर मदद करते हैं।
  • अन्य बच्चों के साथ बातचीत शुरू करने के लिए भी खिलौने* महत्वूर्ण साधन है।

हर उम्र में हर बच्चे के लिए हमेशा एक पसंदीदा खिलौना होता है। बच्चा खिलौने* से जुड़ा हुआ महसूस करता है। कृपया नीचे दिए गए टिप्पणी बॉक्स में उल्लेख करें आपको कौन सा खेल या खिलौना पसंद है।

खुश रहना हर बच्चे का अधिकार है।

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खिलौने? क्या बच्चों को खिलौनों से भरा कमरा चाहिए? पुनर्विचार। 

खिलौने? क्या बच्चों को खिलौनों से भरा कमरा चाहिए? पुनर्विचार करें।

इस तरह से मैं हर बार खुद का मूल्यांकन करती हूं

जब मैं एक खिलौने की दुकान से गुजरती हूं

और मेरी बेटी मेरी तरफ बहुत आशा और उत्साह के साथ देखती है।

क्या बच्चों को खिलौनों से भरा कमरा चाहिए? पुनर्विचार करें। इस तरह से मैं हर बार खुद का मूल्यांकन करती हूं, जब मैं एक खिलौने की दुकान से गुजरती हूं और मेरी बेटी मेरी तरफ बहुत आशा और उत्साह के साथ देखती है।

लेकिन भगवान को  धन्यवाद, मेरे बच्चे अब समझते हैं, उन्हें बाजार में देखे जाने वाले प्रत्येक खिलौने* को खरीदने की आवश्यकता नहीं है।

मैं कुछ तरीके साझा करूंगी, यह उन पर दबाव डाले बिना या उन्हें वंचित महसूस किए बिना किया जा सकता है।

To read in English: Do children need a room full of toys? Rethink.

खिलौने की जरूरत का मूल्यांकन:

हम सभी के लिए बच्चों के साथ घूमने के लिए सबसे अच्छी जगह डिज्नी लैंड हो सकती है।

एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में एक बच्चे के लिए सबसे अच्छी जगह एक खिलौने* की दुकान या एक खेल क्षेत्र हो सकता है।

एक रिसॉर्ट में सबसे अच्छी जगह मैदान हो सकता है।

प्लेस्कूल में सबसे अच्छी जगह खिलौने* के कमरे हो सकते हैं।

लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि एक औपचारिक स्कूल में स्पोर्ट्स रूम, पसंदीदा की सूची में कभी क्यों नहीं आता है?

बस समय में वापस जाओ, और हमें क्या मिलेगा? यह की एक स्कूल में होने वाली पसंदीदा जगहों की सूची में हमेशा शीर्ष पर रहने वाला खेल मैदान ही था।

घर पर खिलौनों के सर्वोत्तम स्रोत:

बच्चों को खिलौने मिलते हैं, उनके परिवार से, दोस्तों से और अब तो मैकडॉनल्ड्स में खाने के साथ भी मिलता है।

वे इन खिलौनों के साथ थोड़ी देर खेलते हैं और फिर यह उनकी अलमारी में जगह घेरता है।

 ऐसा नहीं है कि बच्चे अपने खिलौनों से नहीं खेलते, वे खेलते हैं।

लेकिन वे जल्द ही ऊब जाते हैं।

और एक बार जब बच्चे अपने खिलौनों से ऊब जाते हैं, तो बस इसे अलमारी के बड़े संग्रह में जोड़ देते हैं।

 आपके बच्चे के पास खिलौनों से भरा एक अलमीरा हो सकता है, दो कारणों से:

यह सबसे अच्छा उपहार है जो एक बच्चे को खुश करता है।

मुआवजे के रूप में यह सबसे अच्छी चीज है।

हममें से कुछ लोगों की यह धारणा भी है कि अगर किसी बच्चे के पास अधिक खिलौने* हैं, तो उसका मतलब है कि वह खुश है।

लेकिन हम कभी-कभी इस बिंदु को याद करना चाहिए कि आपके बच्चे को किस तरह के खिलौने की जरूरत है।

और वह कौन सी चीज है जो हमारे बच्चे मांगते हैं?

उत्तर: खेलने का समय।

उनकी अलमारी में रखे जाने वाले खिलौनों को खेलने का समय। बाहर जाने और खुले में खेलने का समय।

मिट्टी में खेलने और गंदे होने का समय, और यह सभी उस उम्र के लिए सच और सही है।

बस उन्हें खेलने का समय दें, वे अधिक खुश रहेंगे।

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Do children need a room full of toys? Rethink.

Do children need a room full of toys? Rethink.

Toys, Do children need a room full of toys? Rethink. This is how I evaluate myself every time when I pass by a toy store and my two sets of twinkling eyes look at me with so much of hope and excitement. But Thanks to God, my children now understand, they don’t need to own every toy they see in the market.

Evaluating need of toys:  

Best place for all of us to visit with kids could be Disney land. The best place for a child in a shopping complex could be a toy shop or a play zone. That in a resort could be play arena. The best place in playschool may be toys rooms.

But have we ever wondered why Sports Room, in a formal school, never comes under this lists of favorites?

Just go back in time, and what did we find? It was the sports ground that was always at the top in the list of favorite places to be in a school.

Best sources of toys at home: 

Children get toys, from their family, friends and now a days even food joints like McDonalds. They play with these toys  for a while and then it occupies a space in their almirah.

 It is not that kids don’t play with their toys, they do.

 Your child might have an almirah full of toys, due to two reasons:

  • It’s the best gift that makes a child happy. 
  • It’s the best thing we provide as compensation. 

Some of us also have a notion, that if a child possess more toys means he is happy.

But we sometimes miss the point, what kind of toy does your child need.

And What is the thing that our children ask for?

Answer: Time to play.

Our children need time to play with the toys. They need time to go out and play in open. Also time to play and get dirty in soil, and this stays true for all ages.

Just give them time to play, they will be happier.

Please comment if you agree to this thought.

Happy childhood is every child’s right.

All the best wishes to you on this amazing journey. This will surely give us easy life.

If these tips help you in finding your answer, please comment. You can also comment, if you are having any other questions related to parenting. 

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Dosti Special Hai, Happy Friendship Day

Sometimes God sends us Angels, disguised as Friends.

Dosti Special Hai, Happy Friendship Day. दोस्ती है ही ऐसी चीज़ जो जब तक करी ना जाए, समझ नहीं आती। ये लंबी या छोटी नहीं होती, ये बस हो जाती है। 


Dosti Special Hai, Happy Friendship Day. दोस्ती है ही ऐसी चीज़ जो जब तक करी ना जाए, समझ नहीं आती। ये लंबी या छोटी नहीं होती, ये बस हो जाती है।

🙂 दोस्ती वो है, जो बचपन में गुल्ली डंडे खेलने के लिए हुई थी।

दोस्ती वो है, जो हर बारिश में कीचड़ में छप्प करने वाले मुस्कुराते चहरे से हो जाती है।

🙂 दोस्ती उन भाई बहन की भी है, जो बिल्ली के बच्चे को दूध पिलाने के लिए चुपके से मां के किचन में होती है।

दोस्ती वो भी है, जो गिरा दूध पिलाने के लिए कुत्ते से होती है।

🙂 दोस्ती उस क्लासमेट से भी होती है, जो होमवर्क ने होने पर अपनी कॉपी दे दे।

Dosti Special Hai, Happy Friendship Day. दोस्ती है ही ऐसी चीज़ जो जब तक करी ना जाए, समझ नहीं आती। ये लंबी या छोटी नहीं होती, ये बस हो जाती है।

Dosti Special Hai,

दोस्ती उससे भी होती है जो, प्रैक्टिकल कॉपी में आपके लिए ड्रॉईंग बना दे।

🙂दोस्ती उन दोस्तों से भी होती है, जो साइकिल हाथ में लेकर भी पैदल साथ चलते हैं।

दोस्ती स्कूल में मिले उस पहले चहरे से भी होती है, जो आके पूछले, तू खाना लाया है कि नहीं, ले ये खा ले, मेरी मां बहुत ज्यादा देती है।

🙂दोस्ती उन आधे समोसों वाली भी होती है, जो बस स्टैंड पर जाकर पॉकेट मनी से खरीदे जाते हैं।

दोस्ती उस पुलिया वाली भी होती है, वो पूरे दिन की बात करवाती है।


Dosti Special Hai, Happy Friendship Day. दोस्ती है ही ऐसी चीज़ जो जब तक करी ना जाए, समझ नहीं आती। ये लंबी या छोटी नहीं होती, ये बस हो जाती है।

Dosti Special Hai,

🙂दोस्ती उस हॉस्टल वाले से भी होती है, जो इंजीनियरिंग की रैगिंग में पूरी रात साथ रहता है।

दोस्ती उस अनजान से भी होती है, जो गुम जाने पर रास्ता बता दे।

🙂 दोस्ती उस मां से भी होती है, जो हर बार, पापा की मार से बचा ले।

🙂दोस्ती उस पिता की भी ऐसी है, जो हर बार गलतियों पे भी बस निहारे।

दोस्ती उस मौसी से भी ऐसी है, की उससे ही लड़ के, उसकी सीढ़ी के नीचे अपना घर बना लें।


Dosti Special Hai, Happy Friendship Day. दोस्ती है ही ऐसी चीज़ जो जब तक करी ना जाए, समझ नहीं आती। ये लंबी या छोटी नहीं होती, ये बस हो जाती है।

Dosti Special Hai,

🙂 दोस्ती उन मुस्कुराते चहरों से भी है, जो हंसके भाभी कहते है।

दोस्ती उन सालों से भी है, जो जीजाजी जीजाजी कह कर साथ रहते हैं।

🙂दोस्ती उन सांस बहू की भी है, जो हर दिन लड़े, पर साथ रहती हैं।

दोस्ती उस यात्री से भी है, जो हर दिन यूं ही मुस्कुराके मिलता है।

🙂दोस्ती उस पान वाले से भी है, जो हर दिन पान के साथ एक कॉम्प्लीमेंट देता है।


Dosti Special Hai, Happy Friendship Day. दोस्ती है ही ऐसी चीज़ जो जब तक करी ना जाए, समझ नहीं आती। ये लंबी या छोटी नहीं होती, ये बस हो जाती है।

Dosti Special Hai,

🙂दोस्ती तो उस भीड़ से भी है, जो सुबह पार्क में चलती है।

दोस्ती उन चार औरतों में भी है, जो समाज में मिलती हैं।

🙂दोस्ती उस चौपाल में भी तो है, जो हर शाम मिलती है।

दोस्ती उन प्लेयर्स में भी है, जो पब जी में मिलते हैं।

🙂दोस्ती उन थके लोगों की भी है, जो हर शाम महफ़िल में मिलते हैं।


Dosti Special Hai, Happy Friendship Day. दोस्ती है ही ऐसी चीज़ जो जब तक करी ना जाए, समझ नहीं आती। ये लंबी या छोटी नहीं होती, ये बस हो जाती है।

Dosti Special Hai,

दोस्ती ये उन सबकी भी है जो बिन मिले facebook, twitter, WhatsApp में होती है।

🙂दोस्ती वो भी है वो नॉनवेज की पार्टी में बिन बोले पुलाव और टमाटर की चटनी बना दे।

दोस्ती वो भी तो है, जब पार्टी से आते हुए, वो बोले, आज गाड़ी तेरा भाई चलाएगा।

🙂दोस्ती उस रिश्ते में भी है, जो पूरी लाइफ के जुड़ते हैं।

दोस्ती वो भी है, जो कह सके हर फ्रेंड जरूरी होता है।

शायद दोस्ती हर वो रिश्ता है, जिसका कोई नाम नहीं होता।


Dosti Special Hai, Happy Friendship Day. दोस्ती है ही ऐसी चीज़ जो जब तक करी ना जाए, समझ नहीं आती। ये लंबी या छोटी नहीं होती, ये बस हो जाती है।

🌸 कुछ रिश्तों के नाम थे यूं ही, 

कुछ रिश्तों को नाम दे दिए, 

🌸 रिश्तों के काम थे यूं ही, 

कुछ रिश्तों को काम दे दिए।

Dosti Special Hai, Happy Friendship Day

Dosti Special Hai, Happy Friendship Day. दोस्ती है ही ऐसी चीज़ जो जब तक करी ना जाए, समझ नहीं आती। ये लंबी या छोटी नहीं होती, ये बस हो जाती है।

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My Long Drive / वो मेरी वाली लॉन्ग ड्राइव/ Good weather Drive

 जरा खिड़की खोल कर देखिए, बाहर मौसम कितना सुहावना है , ठंडी हवा चल रही है। आज आसमान में थोड़े बादल भी है। देखो ऊपर उस चिड़िया को, दोनो पंख फैलाए उड़ रही है। सब कुछ कितना सुंदर है। ये आसमान के बदलते रंग आंखो को कितना सुकून दे रहे हैं। चलो ड्राइव पर चले। आज तो मौसम ही लांग ड्राइव का है। वो मेरी वाली लॉन्ग ड्राइव/ My Long Drive.
Photo by Tom Fisk on Pexels.com

My Long Drive / वो मेरी वाली लॉन्ग ड्राइव/ Good weather Drive. जरा खिड़की खोल कर देखिए, बाहर कितना सुहावना मौसम है।

ठंडी हवा चल रही है। चलो long drive par चलते हैं।

My Long Drive

आज आसमान में थोड़े बादल भी हैं। देखो ऊपर उस चिड़िया को, दोनो पंख फैलाए मजे से उड़ रही है।

सब कुछ कितना सुंदर है।

ये आसमान के बदलते रंग आंखो को कितना सुकून दे रहे हैं।

चलो, आज ड्राइव पर चले। वो मेरी वाली लॉन्ग ड्राइव/ My Long Drive.

क्या! यहां से खड़े खड़े देख लूं। क्यों? बाहर क्यों नहीं जाऊं। आज ही इस मौसम का मजा क्यों नहीं ले सकते?

माना कि आज व्यस्त हैं थोड़ा, पर ऑफिस का ही तो काम है, ऑफिस में कर लेंगे ना।

खाना ही तो बनाना है, रोज ही तो बनती हूं, जरा थोड़ी देर में बना लूंगी।

अरे, बाहर धूल है तो क्या हुआ? गाड़ी का एसी चला लेंगे।

ठीक है ये मौसम भी दुबारा आएगा कभी, पर बादलों में तो ये नहीं लिखा ना, की “आज जाना मना है”।

चलो ना, आज लांग ड्राइव पर चलते हैं। वो मेरी वाली लॉन्ग ड्राइव/ My Long Drive

ये मौसम बस मेरी खिड़की का नहीं है, ये मौसम पूरे शहर का है।

देखो, बाहर वो लाला की किराने की दुकान के सामने, जो लाल मारुति 800 खड़ी है।

ट्रैफिक लाइट के लाल होने के कारण।

उसमे जो महिला बैठी है, शायद कोई भजन सुन रही है। कितना शांत है उसका मन।

बहुत सारी फाइलें पड़ी है बगल की सीट पर, पर फिर भी अभी तो वो अपने में जी रही है।

शायद उसे वो भजन याद भी हैं थोड़े, देखो ना, होंठ हिल रहे हैं, गुनगुना रही होगी।

वो मेरी वाली लॉन्ग ड्राइव/ My Long Drive

वो जो सफ़ेद स्विफ्ट खड़ी है, अरे वो वाली नहीं, वो वाली जिसे को सफ़ेद कुर्ता पहिने सफेद दाढ़ी वाले कोई बुजुर्ग चला रहे हैं।

ध्यान से देखो कार की खिड़कियां चढ़ी हैं। उनको आस पास के लोग देख रहे हैं।

पर फिर भी उनका ध्यान किसी आवाज़ पर है, जैसे, कोई उन्हें कार में ही गुरु ज्ञान दे रहा हो। 

वो मेरी वाली लॉन्ग ड्राइव/ My Long Drive. जरा खिड़की खोल कर देखिए, बाहर कितना सुहावना मौसम है। ठंडी हवा चल रही है। आज आसमान में थोड़े बादल भी है।
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My Long Drive. जरा वो बाइक देखो, शायद वो दोनो लड़कियां स्कूल में पढ़ती हैं, घर जा रही होंगी।

दिन भर स्कूल के बाद दोनो थक गई है।

फिर भी सड़क पर, अपनी बाइक में, पीछे अपनी दोस्त को बैठाए उस लड़की की मुस्कान देखो।

ऐसा स्वतंत्र महसूस करती है वो इस गाड़ी में बैठकर। उसको फिर सारे दिन घर का नियम कानून मानना, हर  बात पे टोका जाना, तुम लड़की को, जरा संभल कर चलो, अंधेरा होने से पहले लौट आयो, कपड़े तो ऐसे ही पहनो ये सब ग्वारा होता है।

चलो ना ड्राइव पर चलें। आज तो दिन ही लांग ड्राइव का है।

वो मेरी वाली लॉन्ग ड्राइव/ My Long Drive.

उस दुबले से लड़के को देखो, दुबला पतला, देखने में तो कोई मनमौजी लगता है।

अपनी ही धुन में, शायद उसे खेल कूद का भी शौक है। हेलमेट लगा हुआ है, तो चहरा नहीं दिख रहा।

पर जरा से झुके कंधों से लगता है, जिम्मेदारियां भी बहुत लिए घूम रहा है।

गाड़ी रोक पैरों को सड़क पर रख कर, जिस राहत से उसने अपनी शर्ट की कॉलर का बटन खोला है।

लगता है मौसम उसको भी अच्छा लगा है।

वो मेरी वाली लॉन्ग ड्राइव/ My Long Drive

उस बाइक को देखो ना एक माता पिता  बैठे हैं। जिस के एक हाथ में झोला है, बीच में एक बच्चा भी है।

माता पिता ने तो हेलमेट पहना है। मगर बच्चे के बाल जो हवा में उड़ कर मुंह पर आ रहे हैं, वो ही खेल बन गया है उसका।

और वो कार में बैठे पति पत्नी।

सिग्नल पर आते ही  पानी पीने बॉटल उठाई पति ने। शायद पानी है नहीं उसमे।

पत्नी ने धीरे से कार का कांच खोला।

हाथ बाहर निकाल कर शायद वो इस मौसम को अपनी मुट्ठी में भर कर अपने साथ ले जाना चाहती है।

पत्नी ने आदतन ही अपनी बॉटल निकाल कर दे दी उसे।

वो मेरी वाली लॉन्ग ड्राइव/ My Long Drive

हा हा हा, उस कुत्ते को तो देखो, अपने मालिक मालकिन के साथ कार में घूम रहा है।

कैसे खिड़की से बाहर मुंह निकले है। लगता है आज पूरी ठंडी हवा वो ही खा लेगा। लार टपका रहा है।

बगल से गुजर रहे बच्चों को देख कर खेलना चाहता है, पर कुछ बच्चे उससे डर रहे हैं, और कुछ उसको चिढ़ा रहे हैं।

मालकिन ने पीछे हाथ से चैन पकड़ रखी है, वरना तो वो आज खिड़की से कूदने को तैयार बैठा है।

उसकी इस हरकत से आगे बैठे दोनो कितना हंस रहे हैं। हर बार की कार यात्रा का ये ही खेल है।

वो मेरी वाली लॉन्ग ड्राइव/ My Long Drive

पान की दुकान के पास वाली उस बड़ी गाड़ी को देखो, guitar रखा है जिसमें पिछे।

उसमे शायद कोई संगीत प्रेमी बैठा है। पास रखी पानी की बॉटल का पानी भी बंद गाड़ी में हिल रहा है।

जरूर ज्यादा बेस में गाना चल रहा है अंदर।

गाड़ी रुकी है तो कांच में देख कर चहरे पर आ रहे बाल भी ठीक कर लिए हैं।

आजादी का ये पल तो उसे भी अच्छा लग रहा है।

चलें आज हम भी लॉन्ग ड्राइव पे। वो मेरी वाली लॉन्ग ड्राइव/ My Long Drive.

My Long Drive. उस चमकती गाड़ी को देखो,

ऐसा लगता है, आज विशेष रूप से घंटों लगा कर साफ़ हुई है।

अंदर बैठा आदमी भी बड़ा तैयार सा बैठा है।

बार बार कांच में देख कर मुस्कुरा रहा है, अपने आप से ही बातें कर रहा है।

कुछ लोग जब खुश होते हैं, तो खुद से ही बातें करने लगते हैं। मौसम का रंग तो इस पर भी चढ़ा है।

उस गाड़ी को भी देखो, पूरी भरी है।

अंदर हंसी ठहाका हो रहा है, ये लोग भी शायद आज मौसम का स्वाद चखने घर से निकले हैं।

वो मेरी वाली लॉन्ग ड्राइव/ My Long Drive

और वो वाली गाड़ी देखो, अरे वाह! देखो, उसमे पीछे की सीट लेटा कर बच्चों का कमरा बन गया है।

माता पिता आगे बैठे हैं, और बच्चे पीछे आराम से खेल रहे हैं।

My Long Drive

देखो छोटे छोटे कुशन भी पड़े हैं। शायद बच्चे खेल कर यहीं सो भी जाएं।

और जरा सड़क के उस पार, उस इमारत को देखो।

वो देखो सबसे ज्यादा हरियाली वाली वो बालकनी। वो मुझे हमेशा ही अच्छी लगती है।

कभी कभी वहां चिड़िया, कुछ अच्छे दिये लटकते है। देखो गौतम बुद्ध की एक प्रतिमा भी रखी है वहां।

अक्सर वहां से एक लड़की मुझे देख कर मुस्कुराती है। उसे भी शायद प्रकृति को देखना खूब पसंद है।

अक्सर हमारी नजरें तब टकराती है जब मैं यूं अपनी खिड़की से बाहर झांकती हूं और वो अपनी चाय का कप लिए अपनी बालकनी पे होती है। आज भी देखो वो वहीं बैठी है, मौसम से हर्षाती हुई।

वो मेरी वाली लॉन्ग ड्राइव/ My Long Drive

ओह! बच्चों को खेलने भेजने का टाइम हो गया। आज तो उनको भी मज़ा आएगी, इस मौसम में उछल कूद करने में।

चलो गाड़ी में छोड़ आते हैं उन्हें। फिर एक राउंड वो मेरी वाली लॉन्ग ड्राइव भी हो ही जाएगी। अरे, थोड़ी हिम्मत करो, चलो।

वो मेरी वाली लॉन्ग ड्राइव/ My Long Drive

फिर क्या था, बच्चों को खुशी खुशी कार में बैठकर और खिड़की खोल कर चल पड़ी हमारी गाड़ी।

रास्ते में बच्चों ने रिमोट से कई बार गाने बदले। मन किया बोलूं कोई एक गाना चलने दो, फिर लगा, उनकी भी तो लॉन्ग ड्राइव है। ग्राउंड आ गया, उन्हें उतार कर गेट तक पहुंचा दिया मैंने।

अब चलें लॉन्ग ड्राइव पर। हां, गाड़ी मै चलाऊंगी, खिड़की के कांच चढ़ा दिए। एसी दो पर सेट। मेरे मोबाइल की फेवरेट गानों वाली लिस्ट ही बजेगी आज।

वो मेरी वाली लॉन्ग ड्राइव/ My Long Drive

और ये हुई गाड़ी चालू। लंबी सड़क, महौल को सूट करते प्यारे गाने।

कार में मुझे जोर जोर से गाना पसंद है, किससे शर्म? उंगलियां अब स्टेयरिंग पर नाचने लगी, गर्दन भी लय मिलाने लगी, कंधे तो इतने खुश हैं कि ताल पर उछल रहे हैं।

बहुत खुश हूं। दिमाग भी इतना ताज़ा जैसे अभी ध्यान करके उठी हूं।

बस इस पल में हूं, पूरा जी रही हूं। कान से कान तक मुस्कुरा रही हूं। और इस गाड़ी में अकेले बस अपने लिए गा रही हूं।

वो मेरी वाली लॉन्ग ड्राइव/ My Long Drive. जरा खिड़की खोल कर देखिए, बाहर कितना सुहावना मौसम है। ठंडी हवा चल रही है। आज आसमान में थोड़े बादल भी है।
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हां, आपने सही सुना, गाड़ी में मैं अपने लिए ही मुस्कुरा रही हूं।

मुझे खुद से बातें करना अच्छा लगता है।

ये मेरे पल हैं। सब के अलावा मुझे खुद के लिए भी तो खुश होना है।

ये यहीं नहीं रुकता, मुझे गाड़ी में अकेले मुस्कुराते और गाते देख कर शायद कोई राहगीर हंस पड़े।

पर उसे क्या पता मेरी इस लॉन्ग ड्राइव का जादू।

अगली बार आप भी चलिए मेरे साथ। मैंने कई बार अपनी खिड़की से बैठे बैठे आपको देखा है उसी सिग्नल पर।

यदि आपको भी लगता है कि मैं आपकी बात कर रही हूं तो मुझे अभी यहीं बताइए।

अगली बार आप उस सिग्नल पर आएं तो देखना, बायें हाथ तरफ के घरों में से एक घर की खिड़की से मैं आपको बाहर देखती मिल जाऊंगी।

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Posted in Blog, Happy childhood

Make precious life lessons

Let’s learn some precious life lessons from the project Rahul got at his school.

(Tuesday morning)

“Rahul,when is your science project submission date. “
“Mumma, it’s next Monday, we still have a week to finish.”
” Rahul, ask your classmates today, what are they making.”
” Why, Mumma?”
“Because, your’s should be the best.”

(Thursday morning)


“Rahul, did anyone deposite their project?”
“Yes, some have done. When will we do our project?”
” Don’t worry, I am there.”

(Saturday evening, after school)


” Rahul, don’t go for playing today, we have to do our project.”

(Sunday)


“Rahul, no playing, we have to decorate our project, it should look the best.”

(Monday, in school)


Teacher: ” Congratulations everyone, for finishing your project works on time. Please come and explain about your project.” Indeed Rahul’s project was well designed and presented.

 But was it needed?Now let’s look at the unseen part of it, to learn our precious life lessons.

Tuesday 2:00 pm, Sarita, Rahul’s mom, had finished all her work, googled all the possible topics for son’s project. She made a list of all the projects, which they can do.
Wednesday, she called some of her friends and relatives to enquire for the best topic to make the project. Then, struck off the common topics from her list.
Thursday 2:00 pm, she deleted the topics that were done by Rahul’s classmates.
Friday she collected all the requirements.
Saturday 2:00 pm, she arranged every thing to one place.Night, Sarita sat with Rahul, after finishing her daily chores. Rahul was sleepy by 11:00 pm so Sarita finished some portions, just to help Rahul.Sunday, They sat again, this time they had to hurry up. Sarita helped him, by finishing most of his work. Rahul’s work was not very neat, so Sarita did the finishing tough to the project.They finished it on time.Monday, Rahul was feeling proud as he was praised by one and all. 

Such a happy ending to the story of making a science project.

But, was it worth? Was it solving the purpose of project work? Was it by anyway helpful to the child? 


You all might not like it, but the answer is NO. A big NO. Was Sarita student of that class? The answer is again NO.

NO. A big NO

Precious life lessons


You can replace mother in this story with father or any other elder. Parent’s mindset puts so much pressure on the learning of the child. It is not Happy parenting. By helping child in work, school projects we are not giving them precious life lessons or stress free childhood. If they do not learn their life lessons, they will not be able to cope up with the ups and downs in life. As long as the effort is done by anyone other than the person it to was meant be, the effort is useless.
It’s not that a child of any age can do their work all alone.
I am just saying, 

BE THE GUIDE, DON’T BE ASSISTANT.

Help him by questions like,

  •  what do you think should be our topic?
  • From where can we get the informative material?
  • Will you just collect some information, then, we will together discuss on the best doable topic.
  • Can you collect the required material, that we have at home, make a list of things we need to buy or arrange. 

And many thought provoking questions like this. 
Let it be your child’s project. 
  

And most importantly, it is not required that it appears best, it should solve it’s purpose the most.

Haha, as a mother, I know, it is tough to control ourselves from taking over the task, but have patience, it is possible.

And believe me, as a teacher, I can assure you, their teacher will like it more, when it is done by your child and not you.

Please make every small experience, a precious learning for life. 

P.s. By making a project by his own, our child is taking small steps towards learning to handle his life.
If you agree to this thought, please like, comment, share and follow. And also comment if you disagree at any point.

We Parents make all efforts to give our child a Happy childhood. While do so, at times we overdo. To know how you can save a preschooler from stress of learning, please read https://happyheartforever.com/2019/07/13/let-me-put-it-differently-to-make-it-a-happy-childhood/

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